शेओपुर, मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश का एक जिला है ग्वालियर और ग्वालियर के अंदर ही एक अनाथालय होता है। बात कर रहा हूं साल 2004 की। वन विभाग से डिप्टी रेंजर और उनकी पत्नी उनकी ख्वाहिश थी कि एक बच्चे को गोद लें क्योंकि उनके पास अपनी खुद की कोई औलाद नहीं थी। वो जाते हैं अनाथालय और जाने के बाद काफी देर तक बच्चों के बीच में वक्त बिताते हैं। इसी बीच में अनाथालय से जुड़े हुए कुछ लोगों से बातचीत करते हैं। कहते हैं कि हमें एक बालक को गोद लेना है। आप हमें सजेस्ट करिए, सुझाव दीजिए कि हमें किस तरह का बच्चा दें? लेकिन इसी बीच में तीन साल का एक बालक कुछ सामान लेकर आता है और बड़े अदब और एहतराम के साथ वो बच्चा सामान दे देता है।
तभी उस अनाथालय के कर्मचारी की नजर उस बच्चे पे पड़ती है। वो कहता है कि साहब देखो यह जो बच्चा है वो तीन साल का है लेकिन इसका दिमाग इतना जहीन है इतना बढ़िया है कि अगर इसको मौका मिले अवसर मिले तो देख लेना ये कल को कलेक्टर बन के दिखाएगा। जब यह बात सुनते हैं वो वन अधिकारी और उसकी पत्नी तो बड़ा अच्छा लगता है। खुश होते हैं क्योंकि बच्चा भी देखने में बड़ा अच्छा सुंदर था। तब उन्होंने कहा कि हां अगर हम इस बच्चे को लें तो? बोले साहब ये तो सोने पर सुहागा हो जाएगा। वैसे भी आप इतने अच्छे हैं, पैसे वाले हैं कोई दिक्कत परेशानी नहीं है। आप ही ले जाओ।
तो जो भी फॉर्मेलिटीज होती हैं उस बच्चे को लेने के लिए कागजी कारवाई होती हैं वो कागजी कारवाई पूरी कर दी जाती हैं और उस बालक को लेकर वो वन का अधिकारी साथ ही उसकी पत्नी अपने साथ लेकर चले जाते हैं। 21 साल का समय बीत जाता है और 21 साल के बाद उसी बालक को अदालत यह सजा सुनाती है कि इसको तब तक फांसी के फंदे पर लटका के रखा जाए जब तक कि इसके प्राण ना निकल जाए। आखिर ऐसी क्या बात हुई थी आज की इस कहानी के माध्यम से यही जानने की यही समझने की कोशिश करते हैं।… पूरी कहानी जानने के लिए नीचे वीडियो पर क्लिक करें