देवरिया / पटना बिहार की राजधानी पटना रेलवे स्टेशन की बात है। एक लड़का टिकट खिड़की पर खड़ा होकर टिकट मांगता है और पूछता है, “देवरिया का टिकट कितने रुपए का है?”
टिकट खिड़की पर बताया जाता है कि टिकट ₹90 का है। वह लड़का अपनी जेब में हाथ डालता है और देखता है कि उसके पास सिर्फ ₹40 हैं। अब उसके पास ₹50 कम पड़ रहे थे।
वह सोच में पड़ जाता है कि इस कमी को कैसे पूरा किया जाए। वह पहले से ही काफी परेशान था। फिर वह सीधे प्लेटफॉर्म पर जाकर एक बेंच पर बैठ जाता है और पूरी रात वहीं गुजार देता है। उसे पता ही नहीं चलता कि रात कैसे बीत गई। पूरी रात वह यही सोचता रहता है कि अब क्या करे, कहां जाए और क्या न करे। परिवार की स्थिति भी अच्छी नहीं थी।
उसके मन में यह भी चल रहा था कि उसे वेल्डिंग का काम आता है और वह जेसीबी मशीन भी चला सकता है। वह सोचता है कि क्यों न वेल्डिंग का काम या जेसीबी ऑपरेट करने का काम शुरू किया जाए। लेकिन साथ ही उसे यह भी चिंता थी कि उसने जो पढ़ाई की है, उसका अब क्या किया जाए।
इन्हीं सब विचारों में डूबा वह रात के बाद सुबह घर लौट आता है और अपने दोस्त को अपनी परेशानी बताता है कि वह समझ नहीं पा रहा है कि क्या करे। उसका दोस्त उसे समझाता है और कहता है कि वह कोई न कोई रास्ता जरूर निकालेगा।
इसी बीच सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह रहेगा कहां, क्योंकि रहने के लिए किराया देना पड़ेगा। तभी मकान मालिक से बातचीत होती है। मकान मालिक कहता है कि उसका बेटा पढ़ाई में बहुत कमजोर है और पढ़ना नहीं चाहता। यदि वह उसके बेटे को पढ़ा दे, तो वह उससे कोई किराया नहीं लेगा।
इस तरह वह लड़का पढ़ाना शुरू करता है। धीरे-धीरे उसके पढ़ाने का तरीका बच्चों को समझ में आने लगता है। आसपास के अन्य बच्चे भी उससे पढ़ने लगते हैं। कुछ ही समय में बच्चों की संख्या बढ़ने लगती है।
किसी को नहीं पता था कि एक बच्चे को पढ़ाने से शुरू हुई यह कहानी आगे चलकर हजारों, लाखों और करोड़ों छात्रों तक पहुंच जाएगी और वह व्यक्ति आगे चलकर “खान सर” के नाम से पहचाना जाएगा।
आज खान सर की ख्याति केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में है। हालांकि फिलहाल वह कुछ विवादों से भी घिरे हुए हैं। इसके पीछे की पूरी कहानी क्या है, इसे आज हम समझने की कोशिश करेंगे।
यह कहानी शुरू होती है उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से, जहां का एक तहसील सलेमपुर है। सलेमपुर तहसील का एक गांव नवलपुर है। यहां खान परिवार रहता था। बेहतर शिक्षा के लिए यह परिवार लगभग 40 किलोमीटर दूर भटपार रानी चला गया, जहां मालवीय नगर नामक मोहल्ले में वे रहने लगे। परिवार के मुखिया का नाम बशीर खान था। उनके तीन बेटे और पत्नी थे।
परिवार की स्थिति को देखते हुए वे खाड़ी देश चले गए, ताकि वहां काम करके परिवार को आर्थिक सहायता भेज सकें। उनकी पत्नी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई संभालती थीं।
सबसे बड़े बेटे का दाखिला एक इंग्लिश मीडियम स्कूल, परमार मिशन इंग्लिश मीडियम स्कूल में कराया गया। बच्चा पढ़ाई में होशियार था और चीजों को जल्दी समझ लेता था, लेकिन उसे भाषा की समस्या थी क्योंकि पढ़ाई अंग्रेजी में होती थी।
हालांकि वह मेहनती था, लेकिन उसे अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता था। वह आठवीं कक्षा तक वहीं पढ़ा। बाद में उसने सीबीएसई बोर्ड छोड़कर यूपी बोर्ड का रुख किया और वहीं से हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की।
इसके बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद (प्रयागराज) चला गया और स्नातक में प्रवेश लिया।… पूरी कहानी जानने के लिए नीचे वीडियो पर क्लिक करें