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Crime

मुस्कान-साहिल Case! सरकारी वकील ने बताया केस का पूरा सच

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मेरठ/उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुए नीले ड्रम हत्याकांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस मामले ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया था। मुस्कान रस्तोगी ने अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर अपने पति सौरभ राजपूत की न केवल हत्या की, बल्कि उसके शरीर के लगभग पाँच टुकड़े कर दिए। इसके बाद उन टुकड़ों को सीमेंट से भरकर एक नीले ड्रम में पैक कर दिया गया।

जब इस घटना की जानकारी अखबारों के माध्यम से लोगों तक पहुँची, तो हर कोई हैरान रह गया। लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि आखिर कोई इस हद तक कैसे जा सकता है।

14 अक्टूबर 2026 को निचली अदालत यानी जिला अदालत की ओर से इस मामले में फैसला सुनाया गया। मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। लेकिन इस मामले में हैरान करने वाली बात यह थी कि कोई चश्मदीद गवाह नहीं था। अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया। यानी, घटनास्थल और मामले से जुड़े साक्ष्यों की एक-एक कड़ी को जोड़कर अपराध की पुष्टि की गई।

अगर हम कानून के इतिहास में ऐसे मामलों की बात करें, तो साल 2004 का धनंजय चटर्जी मामला आपको अच्छी तरह याद होगा। उस मामले में भी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को मृत्युदंड दिया गया था।

ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या साहिल शुक्ला और उसकी प्रेमिका मुस्कान रस्तोगी की सजा हाई कोर्ट में भी बरकरार रह पाएगी या नहीं? इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए हम उत्तर प्रदेश के मेरठ में अधिशासकीय अधिवक्ता श्री के. चौबे से बातचीत करने जा रहे हैं। उन्होंने इस मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी की है।

हम उनसे जानेंगे कि आखिरकार क्या यह मामला हाई कोर्ट की समीक्षा में टिक पाएगा? क्या मामले से जुड़े साक्ष्यों की कड़ियाँ अदालत में कानूनी रूप से पर्याप्त साबित होंगी? तो आइए, चलते हैं और उनसे बातचीत करते हैं।

सवाल: जी, नमस्कार! आपका बहुत-बहुत स्वागत है। नीले ड्रम हत्याकांड में परिस्थितिजन्य साक्ष्य तो मौजूद हैं, लेकिन कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। इस मामले में लोगों की ओर से कई तरह की टिप्पणियाँ सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का कहना है कि कहीं न कहीं न्यायाधीश ने जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया है। इसमें कितनी सच्चाई है?

के. चौबे: नहीं, ऐसा नहीं होता। न्यायालय कभी भी जनभावनाओं या मीडिया ट्रायल के आधार पर अपना निर्णय नहीं सुनाता।

फैसला सुनाने के लिए अदालत के सामने बहुत मजबूत आधार होने चाहिए। विशेष रूप से जिस मुकदमे में मृत्युदंड की सजा दी जाती है, उसमें ठोस सबूत और मजबूत कानूनी आधार होना आवश्यक है।

सामान्य रूप से मामले के वास्तविक तथ्य या तो अदालत को पता होते हैं, या अभियोजन पक्ष को, या फिर अभियुक्त को।

हमने जब इस मामले का अध्ययन किया, तो यह स्पष्ट था कि यह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का मामला था। इसमें कोई प्रत्यक्षदर्शी यानी चश्मदीद गवाह नहीं था। यह बात बिल्कुल सही है।

लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की विशेषता यह होती है कि शुरुआत से लेकर अंत तक, अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए, प्रत्येक कड़ी को सिलसिलेवार और क्रमबद्ध तरीके से जोड़कर प्रस्तुत करना होता है। इस मामले में हम ऐसा करने में सफल रहे।

पुलिस ने भी इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए विवेचना की थी। प्रत्येक पहलू की बारीकी से जाँच की गई और साक्ष्यों की एक मजबूत शृंखला तैयार की गई। शुरुआत से अंत तक एक-एक कड़ी दूसरी कड़ी से जुड़ी हुई थी। हमने इन साक्ष्यों को और मजबूती के साथ माननीय न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।

सवाल: तो क्या आपको लगता है कि यह फैसला हाई कोर्ट में भी बरकरार रहेगा?

के. चौबे: बिल्कुल, हमारा मानना है कि यह फैसला हाई कोर्ट में भी बरकरार रहेगा। हमारे वर्तमान जिला जज साहब बहुत योग्य और विद्वान व्यक्ति हैं।

उन्होंने इस मुकदमे पर अतिरिक्त मेहनत की, मामले का बारीकी से अवलोकन किया और सभी तथ्यों का व्यापक अध्ययन करने के बाद यह निर्णय दिया। मेरे विचार से यह एक सटीक निर्णय है और हाई कोर्ट में भी यह फैसला बरकरार रहना चाहिए।

सवाल: क्या आपकी कभी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला से आमने-सामने मुलाकात हुई?

के. चौबे: हाँ, अदालत में एक-दो बार उनसे मुलाकात हुई थी। जब उन्हें अदालत में बुलाया गया था, तब उनसे भेंट हुई थी। एक बार उन्हें सीआरपीसी की धारा 313 के तहत होने वाली प्रक्रिया के दौरान भी बुलाया गया था।

यह एक न्यायिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत अभियुक्तों के सामने उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप और अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य रखे जाते हैं। उनसे पूछा जाता है कि इन आरोपों और साक्ष्यों के संबंध में उन्हें कुछ कहना है या नहीं।

इस प्रक्रिया के दौरान दोनों अभियुक्तों को अदालत में बुलाया गया था। वे मेरे बिल्कुल बराबर में खड़े थे। उस समय मैं उनके चेहरे के हाव-भाव, चाल-ढाल और बॉडी लैंग्वेज का अवलोकन कर रहा था।

उन्हें देखकर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि वे अपने व्यवहार में बिल्कुल ढीठ थे।

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