बनारस, उत्तर प्रदेश नवंबर 2025 में बिहार प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने थे। लेकिन चुनाव से पहले ही चुनाव आयोग ने 25 जून 2025 से 25 जुलाई 2025 तक मत बिहार मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी कि एसआईआर पर काम कराया। एसआईआर पर काम कराने के बाद एक तर्क दिया कि 65 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। और उसके पीछे कारण यह बताए गए कि 22 लाख ऐसे मतदाता थे जो मर चुके हैं। इसलिए उनका नाम सूची से हटा दिया गया। साथ ही 7 लाख मतदाता ऐसे थे जिनका नाम डुप्लीकेट था।
यानी कि एक-एक का नाम कई कई जगह अंकित था। उसको भी हटा दिया गया और 36 लाख ऐसे भी वोटर थे जो प्रदेश को छोड़कर अन्य प्रदेशों में जाकर बस गए या फिर रहने लगे हैं। तो इस तरह से कुल मिला के जो संख्या बैठ जाती है वो 65 लाख के आसपास बैठ जाती है। लेकिन विपक्षी पार्टियों ने इस बात पर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए और कहा कि चुनाव आयोग की तरफ से बिहार एसआईआर पे जो काम किया गया है उसमें बहुत भारी संख्या में गड़बड़ी है और कुछ ना कुछ इस मामले में घालमेल किया गया है। इसलिए इस मामले की फिर से जांच होनी चाहिए और जांच के लिए बाकायदा योगेंद्र यादव जो कि सामाजिक कार्यकर्ता और याचिकाकर्ता होते हैं एक याचिका दायर सुप्रीम कोर्ट में कर देते हैं और कहतेहैं कि बिहार की एसआईआर पर बहुत बड़ी गड़बड़ियां हुई है। उस पर ठीक से काम किया जाना चाहिए।
12 अगस्त 2025 को इस मामले की सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान योगेंद्र यादव एक महिला और एक पुरुष को अपने साथ लेके आते हैं और लाने के बाद कहते हैं कि साहब यह बिहार के रहने वाले हैं। दोनों के पास वोटर आईडी कार्ड हैं लेकिन मतदाता सूची में इनका नाम नहीं है। इनका नाम यह कहते हुए हटा दिया गया क्योंकि यह मर चुके हैं। बस इतना था कि सुप्रीम कोर्ट में एक तरह से हंगामा सा खड़ा हो जाता है।… पूरी कहानी जानने के लिए नीचे वीडियो पर क्लिक करें